अंबाला कवरेज (साहा, प्रीति शर्मा)। मुलाना विधानसभा क्षेत्र के गांव धनौरा में उस समय विवाद खड़ा हो गया जब अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने एक बुजुर्ग व्यक्ति को गुरू बताते हुए रिहायशी एरिया में बने प्लाट में दफनाने का प्रयास किया। इस दौरान समुदाय विशेष के लोगों ने कब्र भी खोद दी थी और बुजुर्ग को दफनाने की तैयारी थी, लेकिन ग्रामीणों के विरोध के बाद हंगामा खड़ा हो गया। समुदाय विशेष के लोगों का कहना था कि अल्ला को प्यारा होने वाला बुजुर्ग उनका गुरू है और गुरू की अंतिम इच्छा थी कि उसे मरने के बाद उसके प्लांट में ही दफनाया जाए। पुलिस प्रशासन के बीच बचाव करने के बाद समुदाय विशेष के लोग गुरू को उनके पैतृक गांव बरेली में दफनाने पर सहमति बनी और विवाद शांत हो पाया।
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जुटाए तथ्यों की बात करें तो मुलाना के गांव धनौरा में उस समय विवाद खड़ा हो गया, जब समुदाय विशेष के लोग एक बुजुर्ग व्यक्ति को दफनाने आए। ग्रामीणों के विरोध के बाद पता चला है कि मरने वाला व्यक्ति समुदाय विशेष का गुरू था और उसने आश्रम के लिए धनौरा गांव में जगह ली हुई थी। गुरू की अंतिम इच्छा को पूरा करने के इरादे से समुदाय विशेष के लोगों ने रिहायशी एरिया में पड़े प्लाट में गुरू को दफनाने का प्रयास किया, लेकिन लोगों के विरोध के कारण कामयाब नहंी हो पाए। समुदाय विशेष का कहना था कि यह प्लाट गुरू का ही है और यहां पर आश्रम बनाया जाना है। असमय मौत का शिकार हुआ गुरू सढौरा का रहने वाला है।
अल्पसंख्यक समुदाय के गुरू सूफी हबीबुल्ला की करीब 95 वर्ष की आयु में सढ़ौरा क्षेत्र के एक गांव में मौत हुई, जबकि वो बरेली के रहने थे। बरेली उनका परिवार भी रहता है। करीब 20 साल यमुनानगर के जागधौली गांव भी रहे। बीते कुछ सालों से वो धनौरा गांव में रह रहे थे। जहां उन्होंने करीब पांच साल पहले सढ़ौरा दोसड़का मार्ग पर आश्रम बनाने के लिए जगह ली थी। उनके अनुयायी जुनैद नियाजी के अनुसार यहां दफन होने की उनकी अंतिम इच्छा थी। थाना मुलाना प्रभारी चंद्रभान ने बताया कि सूचना मिलते ही मौके पर पंहुच कर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को समझाया गया, जिसके बाद वो अपने गुरू को उनके पैतृक स्थान बरेली में दफनाने पर राजी हो गए। मामले का शांतिपूर्ण हल हो चुका है।